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“पुराने-गीत”

ये तो एक दिन होना है जी
मैंने तुमको खोना है जी

इश्क में सच्चा रब बसता है
हुस्न तो जादू टोना है जी

उनके बिन ये जीना क्या है
एक मुर्दे को ढोना है जी

यार फरिश्तों बाहें खोलो
सांस थकी अब सोना है जी

मुझमे वो पूरा का पूरा
उसमें मेरा कोना है जी

आज पुराने गीत सुनूँगा
मन भारी है रोना है जी

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झगड़ा

अच्छा-अच्छा ऐसा है क्या
तुम लोगों में झगड़ा है क्या

दुनियादारी एक तरफ है
वो रातों में मिलता है क्या

कितना ऊंचा हँसते हो तुम
अंदर कोई रोता है क्या

दिल के बदले जिस्म का सौदा
इश्क तुम्हारा धंधा है क्या

क्या कहते हो मर जाऊंगा
तुमने मुझको देखा है क्या

इन हाथों में तो सिगरट है
उन हाथों में चूड़ा है क्या

जलकर इक दिन राख बनेंगे
दीवानों का होना है क्या

हाय!तुम्हारी जूनी आदत
पूछ रहे हो मरना है क्या

सब ने तुमको छोड़ दिया
तुमने भी सच बोला है क्या

तुमने कैसे होंठ जलाए
तुमने सूरज चूमा है क्या

हम तो सारी रात जगेंगे
चंदा तुमको सोना है क्या

खुद से बरसों बाद मिला हूँ
पूछ रहा हूँ जिंदा है क्या

तन की सीपी मन का मोती
दुनिया भी एक दरिया है क्या

मुझको उसका खत पढ़ना है
यारों खाली कंधा है क्या

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अतीत

दराजे खोल कर देखो कभी तो तुम्हारे सामने रखा हुआ हूँ
मैं वो पत्ता हूँ तेरी डायरी का,फटा कम हूँ मगर बिखरा
हुआ हूँ

कभी पढ़ते नहीं हो क्यूँ मुझे तुम
तुम्हे प्यारा बहुत प्यारा था मैं तो
मुझे चूमा था तुमने उंगलियों से
तुम्हारी भोर का तारा था मैं तो
हृदय की स्याहियों से लिख रखा है
पुरानी जीन्स में लटका हुआ हूँ

तुम्हे किस बात का है डर, बताओ
लिखों मुझपे,पढ़ो मुझको,सुनाओ
यहाँ हर चीज मैली हो रखी है
खुद ही के दाग खुद से मत छुपाओ
कभी थक के मैं खुद ही रो पड़ूँगा
तुम्हारा सोच के अटका हुआ हूँ

किसी सिगरेट किसी बोतल की रंगत
मेरे धब्बों को कब उजला करेगी
भरोगे नींद में जब सिसकियां तुम
तेरे तकिये को ये गीला करेगी
गमो की धुन में खुशियों का तलफ़्फ़ुज़
तुम्हारा मूड हूँ बिगड़ा हुआ हूँ

यूँ जब इंसां से तुम अर्थी बनोगे
तुम्हारा जिक्र जब यादों में होगा
तुम्हारे वास्ते तर्पण भी होंगे
तुम्हारे वास्ते अर्पण भी होगा
मैं तब स्टीकर हूँ दुनियादारियों का
तुम्हारे नाम से चिपका हुआ हूँ

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“इश्क”

मेरे घर के पिणहारे में जो दीपक जलते रहते है
तेरी आँखे उन जैसी है
उन दीवों की आड़ में देखो दो मटके है एक घड़ा है
तेरी इन आँखों के पीछे भी तो इक दरिया रहता है

इन गालों की नरमी,बिल्कुल
माँ की रोटी के जैसी है
छूता हूँ तो भुख लगे है

बरसों पहले एक किले में
एक सुराही देखी थी
फिर तेरी गर्दन देखी तो
यार,सुराही भूल गया

तेरी पीठ का उजला पत्थर
संगेमरमर का सानी है
मेरे जज्बों में भीगा है
मैं ही इसपे फिसलूं हूँ

इन हाथों की ठंडी मिट्टी
मेरे तन की चारागर है
मेरे सारे घाव भरे है
इसके बर्फीले दानों से

क्या तुमने पर्वत देखे है?
वो पर्वत जो तूफानों में
जीने की उम्मीद भरे है
तूने भी तो थाम रखे है
ऐसे पर्वत सीने पे

ये जो कुछ सियाह मोती है
तेरे तन के हिस्सों पर
कुदरत ने तुझको बख्शे है
कुछ नज़रो से बचने को

तेरे पग है देवदार से
तलुए जैसे जूनी चांदी
जितने भी घिसते जाते है
उतने महंगे हो जाते है

लेकिन इन सब बातों से मुझकों
रत्ती भर भी मोह नहीं है
मुझको तेरा बेमतलब का
बच्चो सा गुस्सा प्यारा है
ऊँची भौहों से उल्फ़त है
और रूठा चेहरा प्यारा है
आखिर तुझको हक है जानां
अपनी बाते मनवाने का
एक पल में ही रो देने का
एक पल में ही हंस जाने का
मुझको भी मालूम पड़े तो…
“इश्क कहां आसाँ होता है”

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“उन्वान”

मटकी में पोथों का धुआं
अर्थी में वायलिन की लकड़ी
पलकों पे पतडो के तारे
होंठों पर अँखियों का पानी
तन पे कुछ यादों के चिथड़े
कपाल-क्रिया ना
कलम क्रिया हो
मौत मिले तो ऐसी ईश्वर
यमदूतों को भी गुमान हो
रोज कई बंदे मरते है
आज कोई वरदान मरा है
एक ग़ज़ल की मौत हुई है
दुनिया का “उन्वान” मरा है

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“आँखे”

नींद का घर तलाशती आंखे
ख़्वाब की सम्त झांकती आंखे

मेरे चेहरे के स्याह बर्तन को
अपने पानी से माँजती आंखे

एक टक देखती हुई उसको
उसकी आँखों से भागती आंखे

दोस्ती की हर एक खूंटी पर
इश्क का स्केच टाँगती आंखे

रूह का घाव देख लेती है
मेरी आँखें हैं पारखी आंखे

चैन से सो रहे मुकद्दर में

क्यूँ लिखी है ये जागती आंखे

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गालियां

बदन को खाक करूं खाद ये शजर में दूँ
हमारे इश्क कि बरबादियाँ खबर में दूँ

तुने देखा ही नहीं है मिरे इरादों को
मिरी तो चाह है कि गालियाँ बहर में दूँ