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शराब

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“प्राणायाम”

क्या कहा?
दूर जाना है?
मुझसे?
हम्म
चलो सांस अंदर खींचों…
रोको…
छोड़ो….
उलझ गई ना..
यार तुम प्राणायाम नहीं कर सकती
आत्म हत्या कैसे करोगी

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“कुंवारी”

मुकद्दर पे खुमारी हो गई तो
जो दुश्मन है वो प्यारी हो गई तो

बड़े बेमन से दी है चाय तुमने
लगा लो शर्त खारी हो गई तो

मिरे माथे का बोसा ले रही हो
बलाएं सब तुम्हारी हो गई तो

मिलन की रात में गजलें सुनोगी
तुम्हारी आंख भारी हो गई तो

मिरे हिस्से की यादें छोड़ जाओ
मिरी नज्में कुंवारी हो गई तो

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“Netflix”

मैं ख़्वाब में जब भी
तुम्हारे साथ कोई शाम गुजारता हूँ
उसमें कभी नहीं देखता मैं
हम दोनों को हाथों में हाथ ड़ालकर
छत पे घूमते हुए
या गांव के किसी मेले में
एक झूले पे बैठकर
इक-दूसरे की झूठी कुल्फियां खाते हुए
मैं अक्सर देखता हूँ हम-दोनों को
किसी हिल स्टेशन पे बने हुए
किसी खूबसूरत होटेल के
सबसे ठंडे कमरे में
जहां खिड़कियों से बारिश और पहाड़
दोनों-दोनों साफ दिखते है
तुमने मेरा तोहफे में दिया
वो खुबसूरत गाउन पहना है
और हम दोनों
कॉफी के कप लिए
उस आदमकद बेड पर अधलेटे हुए
नेटफ्लिक्स पर तुम्हारी आईडी से
देख रहे है मेरी पसंदीदा वेब सीरीज
ठंड में कांपती हुई तुम
सो गई हो मेरी हथेली पे
और मैं वॉल्यूम के बटन को
दबाने में लगा हूँ…
तुम्हारी नींद बस नवाज के
डायलॉग पे खुलती है
और तुम मुझे कह रही हो
“सुनो! तुम्हे नींद आये तो सो जाना
मैं देख रही हूं”
सोने से पहले क्लियर तो करती
क्या देख रही हो?
ख़्वाब या पिक्चर
पागल लड़की

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थकावट

मैं जब भी थक जाता हूँ
बैठ जाता हूँ
नज़्मों की दो-चार किताबें लेकर
हर एक नज़्म सोखती है
मेरे माथे के पसीने को
भागते हुए खून को धीमा करती है
अकड़ती हुई नसे ढीली पड़ने लगती है
और आँखों की आग
पानी पकड़ लेती है
तुम्हारी आदतों में भी शुमार है
थक जाने के बाद अक्सर
वक्त-बेवक्त नहा लेना
न जाने उस रोज
कौनसा पहाड़ चढ़े थे हम
कहां भागे थे
कि लग गए थे
इक साथ दोनों
अपनी थकावट उतारने में
मेरी आवाज में
सुन रही थी तुम नज़्में
और मैं नज़्मों की किताब को
नहाते हुए देख रहा था
न जाने कितने लफ़्ज़ों के मानी
तुमने मुझसे पूछे
न जाने कितनी बार आहें भरी
न जाने कितनी बार खिलखिलाई तुम
और मैं,
बाथ टब में भीने हो रहे
उस नज़्मों के पुलिन्दे को
अपने कमरे में सुखाने ले गया…
हम फिर जाएंगे
थकावट उतारने को…

P.C. Facebook

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जहर

मेरी कमीज का पहला बटन
रोज टूट जाता है
मेरा मोबाइल अक्सर हैंग हो जाता है
मैं जब भी
तुम्हारी डीपी देखने की कोशिश करता हूँ
मेरी किताब को भी एक बार
लगाया था सीने से तुमने
उसके गत्ते का रंग उतर गया है
तुमने जो कप दिया था तोहफे में
अक्सर छिटक जाता है मेरे हाथों से
तुम्हारे भेजे हुए खतों की स्याही उड़ रही है
और मेरे जिस्म के वो हिस्से
जहाँ चूमा था तुमने मुझे
अब काले पड़ रहे है
सच कहती थी तुम
जहर मिट्टी में भी छेद कर देता है

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Euthanasia

Euthanasia हाँ इच्छामृत्यु
कितना खुबासूरत लफ्ज़ है
क्या ये अधिकार नहीं हो सकता
उस मुल्क में जहाँ
हर कोई लड़-रहा है अपने लिए
यहाँ कुछ ज़िंदा लाशें भी तो है
जो चाहती है अपने माथे पर
मौत का ठप्पा
करोडों के मुआवजे
1-2 बीघा जमीन
सरकारी नौकरी
वो जो नहीं पा सकता है इस जन्म में
अगले जन्म की कोशिशों की खातिर
क्या उसके पिंजरे नहीं खोल सकते हम
वो जो बीसियों बीमारियों के बाद
अकेला पड़ा है किसी सफाखाने के
बदबूदार बिस्तर पर
उसे गर दे दें मौत की हामी
कितने आराम से मरेगा वो..
जीने का अधिकार भी तो है
मरने का क्यूँ नहीं
सांसे हमारी कब रुके
हमारा फैसला क्यूँ न चले?
वक्त ले कर के देखना, ओ किताबों वालो!
दर्द से कांपतें किसी मन को
मौत कितना सुकून देती है