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“पहला खत”

मुझे खत लिखना है…..
मुद्दत से सोच रहा हूँ कि खत लिखूं मगर परेशानी ये है कि तुमने जाते हुए मुझे फ़क़त शेर लिखने का हुनर बख्शा था तुमने नहीं सिखाया मुझे न बताया न समझाया कि हांसिया कैसे छोड़ा जाए, कैसे शुरू किया जाए कोई खत,खत्म कैसे हो।
तुमने इक रोज कहाँ था मुझे कि मेरी आँखें नज़्म जैसी है और भौहों के पास का तिल कोई मुकम्मल मिसरा.. ग़ज़ल कहने की फ़िराक में हूँ और कही भी है जब जब तुम्हारा मेहंदी के चाँद वाला वो हाथ मेरे गालो पे घूमता हुआ होंठो पर रुका है मगर अदब का एक और हिस्सा जिससे तुम अंजान हो। वो ये है कि मैं खत भी लिखता हूँ…
खत तब,जब मैं बहुत खामोश होता है वो जब मेरे गले की हड्डी बिना कुछ खाये या पीए, सरकती है ऊपर से नीचे।समझ जाओ मैंने हांसिया छोड़ा है एक लम्बा खत लिखने के लिए…
वो जब कांपते हुए हाथ मैं बालों में फिराता हूँ तो समझो पहला लफ़्ज़ लिखा है तुम्हारे मुखातिब होकर…
वो जब अचानक मेरे हाथ का कड़ा घूमने लगता है मेरी कलाई में या वो पुखराज की अंगूठी जब बाहर निकाल ता हूँ पहनता हूँ फिर निकालता हूँ.. समझ लो कि मैं खत में झूठ बोलने की कोशिश कर रहा हूँ..
मेरे पैर जब सिमटते है खुलते है या अटक जाते है कहीं, तो समझो कि मैं किसी लम्हें में अटका हुआ हूं या कि निकल पड़ा हूँ किसी जगह से मेरा रूमाल भूलकर….और सारा उलाहना तुम पर है।
वो जब जनेऊ मेरे कमीज से बाहर लटक रही हो या मेरे गले की माला उलझ गई हो चांद में, तो समझो कि मैं जो कहना चाहता हूं वो तुम्हारे मेरे बीच में किसी तीसरे की बात है।

मेरे बिखरे हुए बाल, अजीब सी हंसी या कि जब तुम्हारे सवालों के जवाब मैं बस हूं-हां मैं देता हूं तो समझो कि खत में किसी तूफान को रोके हुए हूँ मैं..

और भींचे हुए होंठो से तुम्हारे ही आगे मेरे दांत और जीभ मिलकर जब उस ग़ज़ल की हारमनी सुनाते है
फैसला तुमको भूल जाने का
इक नया ख़्वाब है दीवाने का…
तो समझो खत्म कर रहा हूँ मैं खत तुम्हारे उस पसंदीदा शेर के साथ….
ऐसा लगता है कि जैसे खत्म मेला हो गया
उड़ गई आंगन से चिड़िया घर अकेला हो गया…

तुम्हारी गिलहरी
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“तस्वीरें”

आंखे भी तस्वीरें खेंचा करती है
जब होंठो को छूता है रंगीं शरबत
तब जेहन की रील में सुर्खी घुलती है
कुछ तस्वीरें कागज पे आ जाती है
कुछ को मैं पलकों पर अटका देता हूं
कुछ तस्वीरें रखी हुई है टेबिल पे
तुम भी एक दिन फुरसत से घर आकर के
तुमको प्यारी सब तस्वीरें ले जाना…

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“सोचने के पैसे”

सोचने के पैसे लगते है?
नहीं!
तो तुम सोचती क्यूँ नहीं,
हमारा साथ
हमारा घर,
बारिशें
खिड़कियां
गैलरी
किताबें
चाय
पहाड़
पकौड़े
औऱ अगर तुमने सोच रखा है
हमारा अलग होना,
किसी जंगल को
सुलगता हुआ देखती हो तुम,
तुम्हारे दिमाग मे
पहाड़ के तले
दबकर मर रहा है कोई गांव
तो सुनो!
मान लो
सोचने के पैसे लगते है….

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“सुनाई देने लगा”

लहर थमी तो संमदर सुनाई देने लगा
मुझे तूफान मिरे अंदर सुनाई देने लगा

किसी किताब में मौहब्बत का लफ्ज़ यूँ चीखा
मुझे फिराक का मंजर सुनाई देने लगा

मिरे पतंग ने कटकर जमीं को चूम लिया
मिरे मयार को कलंदर सुनाई देने लगा

मैं उसके होंठ लगा हूँ तो किस खयाल में हूँ
चुभे है आह औऱ खंजर सुनाई देने लगा

–धीरज दवे

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“प्राणायाम”

क्या कहा?
दूर जाना है?
मुझसे?
हम्म
चलो सांस अंदर खींचों…
रोको…
छोड़ो….
उलझ गई ना..
यार तुम प्राणायाम नहीं कर सकती
आत्म हत्या कैसे करोगी

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“कुंवारी”

मुकद्दर पे खुमारी हो गई तो
जो दुश्मन है वो प्यारी हो गई तो

बड़े बेमन से दी है चाय तुमने
लगा लो शर्त खारी हो गई तो

मिरे माथे का बोसा ले रही हो
बलाएं सब तुम्हारी हो गई तो

मिलन की रात में गजलें सुनोगी
तुम्हारी आंख भारी हो गई तो

मिरे हिस्से की यादें छोड़ जाओ
मिरी नज्में कुंवारी हो गई तो