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“बात”

उनसे मेरी बात करो ना
मिलने वाली रात करो ना

बगिया-बगिया फिरते हो तुम
फूलों की बरसात करो ना

पानी पर कंकर की चोटें
पत्थर से भी घात करो ना

हूँ-हूँ,हूँ-हूँ,क्च-क्च
ऐसे चटकारो को छोड़ो
धीमे-धीमे बात करो ना

मेरा टीका तेरी टोपी
महबूबी को जात करो ना

कबसे तुमको ढूंढ रहा हूँ
थोड़ा ऊपर हाथ करो ना

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“दवा”

वो तो चाहता है कि खुदा हो जाए
उसको लेकिन खुदा करेगा कौन

जिसक़ी फितरत में जालसाजी हो
उससे आखिर वफ़ा करेगा कौन

मैं जमीं हूँ तो तुम आसमाँ हो जाओ
देखते है हमें अब जुदा करेगा कौन

देखकर जख्म मेरे तू भी अगर रो देगा
राहत-ए-जाँ बता फिर दवा करेगा कौन

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दस्तूर

ये जो कुछ लोग मेरे अपने है
मुझको मजबूर बहुत करते है

नसीबों को रफू करा तो लूँ
वो मगर दूर बहुत करते है

टीका,माला,जनेऊ,पीताम्बर
अनाड़ी दस्तूर बहुत करते है

वो जो किसी के सगे नहीं होते
वो हुजूर-हुज़ूर बहुत करते है

फिर उन्हे कोई पूछता ही नहीं
जो ना-नुकुर बहुत करते है

मैं कभी छत से कूद जाऊंगा
जख्म मशहूर बहुत करते है

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“यार कलंदर”

आखिर कितना अंदर जाऊं,कितना अंदर है
तेरे अंदर तेरा कोना,कितना अंदर है

मैं पूछुं तू बोले ना,तू पूछे तो मैं मर जाऊं
हममें जो है इश्क नहीं है ये तो जंतर है

जग के लफड़े,घर की चिंता और माजी
तेरा जी तो बाग है लेकिन ये सब बंदर है

छोड़ शिवाला तोड़ के माला आ जा तू
मेरी हिचकी गीता है तू खुद मंदर है

सरसगीत मनमीत पुकारे प्रीत धरे धन नाहीं
नाच रहा हूँ धुन पे इसकी, यार कलंदर है

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“फरमान”

जब ठाले थे तब बहुत लिखा हमने
अब काम वाले है तो बस पढ रहे है

जहाँपनाह जरा इसपे भी गौर कीजे
आपके हाथी चींटियों पर चढ़ रहे है

रात रोयी बहुत चाँद ने सजदे किये
सुना था कि जुगनू आसमाँ गढ़ रहे है

तेरे बाद हमसे आखिर कौन खेलेगा
बस यही सोच के मेरे बाल झड़ रहे है

सियासत-बगावत,मौहब्बत-इबादत
ये शोर किसका है ये कौन लड़ रहे है

बुरा न माने ऐ यार! तो कहूँ तुझसे
इश्क कम है तेरे फरमान बढ़ रहे है

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“धर्म”

यदि आप नदी को पूजते है यदि आपकी आस्था पेड़ो में है (गंगा-यमुना-नर्मदा आदि सभी नदियां और पीपल बरगद ,तुलसी आदि सभी पेड़ पौधे हिंदू एवं सनातन धर्मानुसार पूज्य) यदि आप अपने से बड़ो को प्रणाम या नमस्ते करते है(हिन्दू पूजा में आवहान पद्धति)यदी आप किसी तस्वीर के आगे दीप, धूप या अगरबत्ती करते है(धूपं,दीपम दर्शयामि) यदि आपके नाम में राम है अर्जुन है भीम है लक्ष्मण है शिव है पार्वती है दुर्गा है लक्ष्मी है (हिन्दू देवी देवताओं के नाम) यदि आप सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण में सूतक,मोक्षकाल एवं दान लेने अथवा देने में विश्वास रखते है यदि आप अमावस्या को कोई शुभ काम नहीं करते यदि आप किसी विशेष वार को किसी विशेष दिशा की तरफ नहीं जाते,यदि आप राखी, दशहरा,होली,दीवाली,नागपंचमी,गोगाचतुर्दशी,श्राद्ध,नवरात्री,कृष्ण जन्माष्टमी,गणेश चतुर्थी,गणगौर,तीज,मकर सक्रांति आदि त्योहार मनाते है यदि आप किसी अपने की मौत पर मुंडन करवाते है अस्थि विसर्जन करते है मुखाग्नि देते है शोक रखते है गहरे कपड़े पहनते है, यदि आप शकून-अपशकून में विश्वास रखते है यदि आप गुरु पद्धति का पालन करते है,यदि आप चैत्र,वैशाख जैसे महीनों में, कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष जैसे अवधियों में और प्रतिपदा,द्वितीया आदि तिथियों में विश्वास रखते है और ऐसी हज़ारो बातें जो हिन्दू अथवा सनातम धर्म का आधार है उनसे अगर आप प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए है तो आप सनातन धर्म का चाहे कितना ही विरोध कर ले,हिंदुओं को चाहे कितनी ही गालियां देवे ब्राह्मणों में भले ही आपका विश्वास न हो फिर भी आप अपने पितरों की तरफ से एवं जड़ो से सनातनी हिन्दू है और आपकी स्थिति ठीक उस पुत्र जैसी है जिसने नासमझी में अपने पिता का घर छोड़ दिया है सरकारी कागजों में भी बदलाव कर दिया है लेकिन,खुद का डीएनए नहीं बदल पा रहा।
भगवान सबको सद्बुद्धि दे
#स्वस्ति
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“अग्नि-त्राटक”

टूटे बिखरे पाँख लगाए बैठे हो
तुम कुर्सी पर आंख लगाए बैठे हो
शिव पूजा में भस्मी सजती माथे पर
तुम तो घर की राख लगाए बैठे हो
ब्राह्मण की बोटी सिंकती है
कानूनों की चिमनी पर
तुम गिद्धों से हांडी पर ही
नाक लगाए बैठे हो
सेवा का आडम्बर छोड़ो
तुम सत्ता के दास रहो
भूखे-नंगे मंगते मारो
तुम पैसो के पास रहो
ये मेरी गलती है की
मैने तुमको अपना माना
हक की खातिर जान लड़ाई
दुविधा को सपना जाना
मुझको अपने सभी गुनाहों का
अब पश्चाताप मिले
वोट मिले न तुमको
अबकि NOTA जैसा बाप मिले
जो भी मांगा सब दे डाला
ग्राम,राज्य और देश हमारा
तुमने फिर भी बात न समझी
अपनो की औकात न समझी
गैरों की गोदी में बैठे
राजनीति की जात न समझी
जैसे तुमको कुर्सी प्यारी
हमको निजता प्यारी है
हाथो में हथियार नहीं पर नैनों में चिंगारी है
अग्नि त्राटक भले सुना हो
उसका ढंग बताएंगे
हमने जितने शोले देखे
तुमको भी दिखलाएंगे
हमने जितने शोले देखे
तुमको भी दिखलाएंगे