“झूठ”

ये जो लोग दिखाई देते है तुम्हें रंगीन सूट-बूट में
सैंकडों बून्द खून पी जाते है ये बस एक घूंट में

अकाल पड़ने पर ये भेजते है तुम्हें दाना-पानी
और खुद शरीक हो जाते हैे बादलो की लूट में

क्या गज़ब है के करोड़ो खर्चते निज श्वान पर
और हाथ में चाँदी का खप्पर ले खड़े है छूट में

सांस की इज़्ज़त नहीं न जान की चिंता इन्हे
लाश पे सेंके है रोटी और खेलते है ये फूट में

ओ गरीबो! अब तो अपने आप की परवाह करो
क्यूँ इन्हें अपना समझकर जी रहे हो झूठ में

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“मसीहा”

मसीहा मत बनाओ तुम मुझे इंसान रहने दो
मुझे पहचान की चाहत नहीं अंजान रहने दो

सितारा हूँ मैं रातो के स्याह होने पे चमकुंगा
अभी सूरज नहीं डूबा मुझे गुमनाम रहने दो

तुम शाह-ए-अमीरा हो तुम्हें हक़ है गुमानी का
मैं साथी हूँ फकीरों का मुझे आसान रहने दो

सयानापन समझदारी मुबारक हो तुम्हे सारी
न सीखलाओ मुझे ये सब मुझे नादान रहने दो

चरासाजो जरुरी है मुझे मरना ही है एकदिन
दवा-दारु से क्या होगा के ये अहसान रहने दो

सितमगर है मैं मानु हूँ निगाह-ए-यार के सदके
मुझे मिटने की आदत है मुझे कुर्बान रहने दो

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