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“जज्ब-ए-इश्क”

जज्ब-ए-इश्क उतर गया है जिगर से मेरे
मेरी निगाह अब कोई गुनाह नहीं करती

मौत आती है मगर हर बार बच जाता हूँ मैं
और वो कहती है की मैं दुआ नहीं करती

अजीब आदत है हर एक हसीन सूरत की
वफ़ा चाहती है मगर खुद वफ़ा नहीं करती

उसके होठों में चरासाजी का हुनर अच्छा है
पर सितम ये है की वो मेरी दवा नहीं करती

हर एक पत्थर को मैंने भगवान बना रखा है
कैसी किस्मत है मेरी कुछ भला नहीं करती

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“तारीफ”

अपने झगडे के 2 दिन बाद आज अभिनव ने पूरी तैयारी के साथ ख़ुशी को मैसेज किया।
हाय ख़ुशी!कैसी हो?
“ठीक हूँ”ख़ुशी ने रूखेपन से जवाब दिया।

अभिनव ने अब अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा।

अच्छा सुनो “तुमने कल तुम्हारें बाल धोये थे क्या?

हाँ !लेकिन “तुमने ये क्यों पूछा”,ख़ुशी बड़बड़ाई।

अरे कल शाम से टीवी पर खबर चल रही है देहरादून में बादल फटा, हुई जोर की बारिश; पागलों को ये पता नहीं है मेरी जान बाल सुखा रही थी।

ख़ुशी शरमाई और फिर बहुत जोर से हँसी,एक ही पल में अभिनव और ख़ुशी के रिश्तों में जमी बर्फ फिर से पिघल गयी।मौहब्बत अपनी मासूमियत पे खिलखिला रही थी और हुस्न अपनी “तारीफ” पे इतरा रहा था।

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“चँदा”

मायड़ भाषा राजस्थानी में लिखी हुई मेरी दूसरी रचना,इस बहाने कुछ लोगों की शिकायते दूर कर रहा हूँ जो कहते है “तुम राजस्थानी में क्यों नहीं लिखते?”

बहुत साल पहले जब मैंने लिखना शुरू किया था तब 16 साल के एक लड़के का आधीरात को चन्द्रमा से संवाद लिखा था जो कुछ यूँ था

“चाँद तू भी है अकेला और मैं भी हूँ अकेला
सो रहा है ये जगत् छोड कर सारा झमेला

जग रहे है अब हमीं बस क्यों न थोडा गुनगुनाये
चल विरह का गीत गाए,चल विरह का गीत गाए”

इस रचना का अगला भाग मेरे पास अब नहीं है(लापरवाही की वजह से खो गया है),मगर इसी से प्रेरणा लेकर लिखी हुई मेरी राजस्थानी की रचना “चँदा”।

“रे चंदा डागलियें ढब जा के पाणो अब के खोणो है
थारी मारी पीर सरीखी थारो मारो एक रोणो है

थु भी रात रखड़तो फिरतो मैं भी भीत भचेड़ा खाउँ
आँखड़लियां रो नीर सुखियों खुद रे हेत मरसिया गाउँ
इन कलजुग में प्रीत निभाणी अंधारे डोरो पोणो है
थारी मारी पीर सरीखी थारो मारो एक रोणो है

के तो मैं पंछिडो होतो यूँ ही उड़तो बन-बन फिरतो
के मैं फूल हज़ारी होतो मंदिर अर् देवरिये चढतो
ओ काई मिनख जमारो मलियो सारी उमर नरक धोनो है
थारी-मारी पीर सरीखी थारो मारो एक रोणो है

मीत मळे मोतीडा जैडो हिवड़ा री सीपी में राखूं
प्रेम हुवे गंगाजल जैडो नैन झुकाऊं रज-रज चाखूं
फेर भळे बळबळती कांबळ ओढ़ मसाणा में सोणो है
थारी-मारी पीर सरीखी थारो मारो एक रोणो है”

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“मनवा”

धीमें-धीमें फीका पड़ता जाए है
तेरा चेहरा मन से बिसरा जाए है

मुझको है न प्रीत न उससे लाग कोई
तो क्यूँ रोऊँ हूँ क्यूँ मन धोखा खाये है

सब बातें है बातों का क्या है आखिर
मन जाने है मन मन को समझाए है

वो झूठा है मैं झूठा हूँ सब झूठे है
फिर क्यूँ मनवा सांचा मोह लगाए है

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“इंसान”

मुस्कुराउँ हूँ तो मसखरा न समझ
महज मिट्टी नहीं हूँ 
मुझमें जान भी है
जिस्म को चूम लिया अब
रूह को भी टटोल
तेरे बिस्तर का खिलौना है जो
वो इंसान भी है

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“साँसों की माला”

आ सको तो आज आओ,कल का वादा मत करो
कल मेरी साँसों की माला टूट जाए क्या पता
रेशमी रिश्ते है और अहसास मलमल डोरियाँ
वक्त की फिसलन में अपने छूट जाए क्या पता

मैं सुबह हूँ गांव की तुम शहर की शाम हो
मैं दुआ का गीत हूँ और तुम मेरे भगवान् हो
आस को आकाश दो पत्थर की मूरत मत बनो
फिर मेरी आँखों से सपने रूठ जाए क्या पता

प्रीत की पाती लिखूँ या पीर का परवान दूँ
पास बैठो और छुओ कैसे तुम्हें आवाज़ दूँ
हुस्न का नायाब हीरा नूर का फानी महल
उम्र का वहशी लूटेरा लूट जाए क्या पता

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“रौशनी”

मेरे ख़्वाबों की किताबों को कुतरती है रौशनी
सुबहं को जब भी छत पे उतरती है रौशनी

पल भर में सारे राज पर्दाफाश होते है
बस्ती में जब भी गश्त पे निकलती है रौशनी

मज़दूर के माथे का जब पसीना चमकता है
मुझको किसी जौहरी सी तब लगती है रौशनी

मेरे महबूब जैसी है वो मेरे गालो को चूमे है
कभी नादान लगती है बहुत हँसती है रौशनी