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“मनचला”

अब भले तू गैर है लेकिन कभी मेरा तो था
मुस्कुरा लेगा अगर तो क्या बुरा हो जाएगा

शाम जो है ये शहर में तितलियों का वक्त है
गांव वालो देख लो मौसम हरा हो जाएगा

यार की अंगड़ाइयां ये उम्र और ये हौसला
धड़कने कहती है के मुझसे गुनाह हो जाएगा

चाँद शायद रात के कमरे का पहरेदार है
जो कभी मासूम था पर अब जवाँ हो जाएगा

ऐ मोहब्बत बख्श दे मेरी गली मेरा शहर
गर कोई टूटा तो मुझसा “मनचला” हो जाएगा

न जाने क्यों ये ग़ज़ल मुझे अपूर्ण लग रही है,आप सभी बुद्धिजीवी मित्रों से इसी काफिये में ‘शेर’ आमंत्रित है।

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“ग़ज़ल”

सुबहं का सामाँ उठा तन्हाइयां बिछने लगी
पहलु-ए-शब में तेरी परछाइयाँ दिखने लगी

किस कदर दीवानगी का है समाँ मैं क्या कहुँ
मखमली सेजो पे भी अब करवटें बढ़ने लगी

ज़िन्दगी और मौत में अब फासला इतना ही है
के मैयतों के साथ ही शहनाइयां बजने लगी

आह!ये जलती हवा और उम्र का लंबा सफ़र
जान जो प्यारी थी मुझको अब मुझे चुभने लगी

दोस्ती की शाख से गिरने लगे पत्ते सभी
मुफलिसी जब से मेरे बागान में रहने लगी

आखिर ख़त है मेरा ये आखिरी अश्आर है
ऐ दर्द! आकर थाम ले, तेरी “गजल” मरने लगी

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“त्यौहार”


तिमिरधि में दीपमाला को सजाना बाद में
देह वस्त्रो से सजा भौतिकता दिखाना बाद में
स्वार्थ पर श्रद्धा चढ़ा लक्ष्मी मनाना बाद में
अज्ञ के तम को मिटाने चलो विज्ञ ज्योति जगाये

काष्ठ का रावण जलाना बस है अपना मन मनाना
मौन निर्जीव पूतले से क्या कोई सीता छुड़ाना
राम बन रावण जो छल गया है अपनी मैथिली को
लो चलो हम मैथिली के उन बंधनों को तोड़ आए

क्या करूँ रक्षा तेरी रक्षा में सक्षम मैं नहीं
द्रौपदी की लाज रखी ऐसे कृष्ण के सम मैं नहीं
पर हाथ में बाँधी जो राखी दे रहा हूँ ये वचन
आये जो तुझपे आपदा तो पहले वो मुझको मिटाये

न हरा न लाल हो न और कोई रंग हो
मीत ये चाहत है मेरी तू सदा ही संग हो
पीर तेरी मैं सहूँ तू मेरी खुशियां जिए
एक सी सिसकी भरे हम एक जैसा खिलखिलाए

आठवीं कक्षा में भारतीय त्यौहारो के सन्दर्भ में लिखी हुई मेरी ये कविता,आज किताबें पलटते हुए मिली…वैसी की वैसी पोस्ट कर रहा हूँ।आपका प्यार अपेक्षित है।

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“छूअन”

सुनो!
उस की मानिंद मत छुओं मुझको
उसने तो निभायी थी बस एक रस्म
या के कोई एहसान किया था
या के तैयार किया था मुझे बिखरने को
मेरा एक जख्म सिसकने को बेकल है
वो छूअन, जो कभी ख़त्म न हो
तुम छुओं,उस तरह
के जैसे तुम समझते हो मुझे
तुम्हें परवाह है मेरी
किसी अश्आर में जैसे मेरा वजूद गुम होता है
किसी नज़्म में जिस तरह मैं खुद से मिलती हूँ
सुनो!वक्त फानी है,छूअन जरूरत है
और हाँ मुझको किसी हादिसे का डर है
Poetry By Intrudesite Translated by Dheeraj dave…

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“कोशिश”

सब जैसा बनने की कोशिश करते-करते
अब तो ये भी भूल गया के मैं कैसा था

देखा एक सीधे बच्चे को आज बिगड़ते
मुझको आया याद कभी मैं भी ऐसा था

सबको मुझसे प्यार मुझे खुदसे ही नफरत
पहले खुदको प्यारा था मैं चाहे जैसा था

जबसे इश्क हुआ है सब ये कहते है
देखो! अब कैसा है,ये पहले कैसा था

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“Couplets”

1.ऐसा लगता है के जैसे वक्त जाया कर दिया
मैंने तुमको चाहके खुदको पराया कर दिया
2.मखमली बिस्तर में सलवटों सी पड़ी रहती है
गरीब की खुशियां भी तवायफ सी हुआ करती है
3.इश्क में भी उसूल रखता है
उससे मिलना फ़िज़ूल लगता है
वो जो बहुत कहकहे लगता है
दिल से तन्हा जरूर लगता है
4.हलक तक भर गया हूँ के कुछ भी गवारां नहीं होगा
ये जिस्म हो भी जाए मगर दिल तुम्हारा नहीं होगा..