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“विश्व-सहित्य”

बहुत सालो पहले एक बात पढ़ी थी की इस दुनिया का हर रचनाकार दूसरे रचनाकार जिसे वह जानता तक नहीं है से एक अदृश्य धागे से जुड़ा है…और इसी कारण कई बार लोग जिसे नक़ल कहते है स्वयम्भू रचना,प्रेरणा या महज़ प्रभाव निकलती है।पिछले कुछ दिनों से मेरा सबसे पसंदीदा कार्य साहित्य पठन कर रहा हूँ।विख्यात रचनाकार पाब्लो नेरुदा को पढ़ना मेरे जैसे साहित्यप्रेमी के लिए गंगा नहाने जैसा है।प्रेरणा,प्रभाव या कुछ और इसकी बानगी आपके सामने रख रहा हूँ:-

If you will stop loving me little by little
I will stop loving you little by little
If you will forget me
Don’t look for me, I will forget you…
#PabloNeruda

प्रेम अकेला जी नहीं सकता
जीता है तो दो लोगों में
मरता है तो दो मरते है
#गुलज़ार

दोनों और प्रेम पलता है
सखी पतंग भी जलता है और दीपक भी जलता है
#मैथिलीशरण_गुप्त

इन सभी रचनाओं का एक ही अर्थ है की प्रेम के पौधे को बढाने के लिए प्रेम की खाद की ही आवश्यकता होती है।
एक जैसे भावो को व्यक्त करने के लिए इतनी सारी विविधता…सलाम है ऐसे रचनाकारों को और उस धागे को जो एहसासों की त्रिवेणी के बहने का माध्यम बना हुआ है।

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विज्ञान औऱ धर्म

विज्ञान में और धर्म साहित्य में कई बार समानता देखने को मिलती है,सौभाग्य से मैं दोनों का ही विद्यार्थी हूँ।सनातन धर्म की प्रासंगिकता पर उंगली उठाने वाले पेशेवर बुद्धिजीवियों के लिए आज “विष्णु सहस्त्रनाम” का एक श्लोक लाया हूँ जिसमें ईश्वर को परम बताया गया है अर्थात् ब्रह्माण्ड का हर भाग इस परम कण “ईश्वर” से बना है…..

परमं यो महत्तेज: परमं यो महत्तप:
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यत्परायणम्

वहीँ विज्ञान भी कहता है की ब्रह्माण्ड का हर भाग परमाणु से बना है जिसके बिना संसार की परिकल्पना बेमानी है।

तथ्य:-2
ऊष्मा गतिकी के एक नियमानुसार ऊष्मा/ऊर्जा न तो नष्ट की जा सकती है न ही बनाई जा सकती है वो केवल अपना रूप बदलती है।

हमारे धर्मशास्त्र कहते है “आत्मा न तो जन्म लेती है न मरती है वह केवल अपना शरीर बदलती है।”

ऊर्जा और आत्मा का ये सम्बन्ध युगों-युगों से परिभाषित है…सैकड़ों ऐसे उदाहरण है जो हमारे धर्मशास्त्रो की महत्ता को प्रासंगिक बनाते है और हमें गौरवान्वित होने का अवसर देते है।img-20170101-wa0001