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🙏🙏

और अब कुछ दिनों या शायद महिनो के लिए wordpress से छुट्टियां ले रहा है,एक सफ़र में हूँ अब मंजिल मिलने के बाद ही लौटूँगा।😊😊

बहुत सी खूबसूरत रचनाएँ ले कर लौटूँगा।

“स्वस्ति”

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“खूँ”

तुम्हारे जिस्म के कुछ एक हिस्से
तुम्हे मालूम हैं क्यूँकर गुलाबी?
तुम्हारे नूर के पौधे की खातिर
मैंने उनके जरिये “खूँ” दिया है

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सुनो!

सुनो!
मैं अब आज़ाद होना चाहता हूँ
तुम अपने बदन मैं कैद कर लो

मैं अब खामोश होना चाहता हूँ
तुम अपने लबो का शोर दे दो

मैं अब राख होना चाहता हूँ
तुम अपने तले की आग दे दो

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“Revenge”

Girl,are you talking about
“revenge” of our past?
Okay,
Let’s start with kisses”

तुम्हारा होंठो पे दबे पड़े है बीसियों शिकवे
हो इज़ाज़त अगर
तो अपने होंठो से
तुम्हारे चन्द शिकवे कुरेद लूँ

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“गुलाबी”

मैं सख्त पत्थर हूँ
और वो नर्म फूलों सी
मगर फिर भी
हम जो एक दूसरे को छूते है
तो बिखरते नहीं संवर जाते है
वो मेरे सीने पे
अकड़ती है,तनती है ठहर जाती है
मैं उसकी पीठ पे फिसलता हूँ,उतरता हूँ
भीग जाता हूँ
वो मेरी टकराहटों से अब
सख्त होती जा रही है
मैं उसके चूमने से
अब गुलाबी पड़ रहा हूँ

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“अखबार”

मेरे जिस्म के तले में
रहती है एक पढ़ाकू लड़की
वो लड़की जिसे उस रात
तुम सुना कर आये थे
जमाने की खबरें
सुनो! वो लड़की
अब फिर से बहक रही है
उसे आदत हो गयी है
तुम्हारी खबरों को पढ़ने की
अगर मौका मिले
तो फिर आ जाना
सर्द रातो में
तुम्हारे जिस्म के तले का
“अखबार” फेंकने

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“Erotica-My Version”

मुझे एक मोहतरमा ने कहा की तुम “erotica” नहीं लिख सकते,मैंने इस बात को challenge के तौर पे लिया।सोच रहा हूँ कुछ रोज फकत erotica ही लिखूं।
पहला संस्करण पेश-ए-खिदमत है।😊😊

हमारे जिस्मो की जिल्द उतर गयी है
मैं उसकी रूह के लफ्ज़ रट रहा हूँ
और वो टटोल रही है
मेरे कुछ सख्त पन्ने  अपनी नर्म उंगलीयों से
सफ़हे अटक रहे है सिसकियों में
सिसकियाँ उलझ रही है बिस्तर में
किताबें पुरानी है मगर तरीका नया है
हम जी लगा के यूँ ही
पढ़ते है अक्सर एक-दूसरे को
सुबह पडते ही
वो मेरे सवाल भूल जाती है
मैं उसके जवाब भूल जाता हूँ
ये इश्क का “ककहरा” है साहेब
गर सब कुछ याद हो गया
तो जवानी जाहिल हो जायेगी