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“तुम्हारी तस्वीर”

मेरे कमरे की दीवार पर टंगी फोटो फ्रेम ने संभाल रखा था

तुम्हारी तस्वीर को

तुम्हारी तस्वीर जिसमें पहन रखी थी नीली ड्रेस तुमने

तुम्हारी तस्वीर जिसे देखकर मेरी बहनों ने चिढाया था मुझे

तुम्हारी तस्वीर जिसे कई रात सिरहाने रख के सोया था मैं

तुम्हारी तस्वीर जिसे देखकर लोग बहुत कुछ पूछते थे मुझे

तुम्हारी तस्वीर तल्ख़ रिश्तों के बाद भी जिसमें मुस्कुरा रही थी तुम

तुम्हारी तस्वीर फाड़ने के बाद जिसे कई बार समेटा मैंने

तुम्हारी तस्वीर जिससे आजकल नजरें चुरा रहा था मैं

तुम्हारी तस्वीर जिसे खुद से ही छुपा रहा था मैं

तुम्हारी तस्वीर उखड़े रंगो में उभरा सबसे खुबसुरत चित्र

तुम्हारी तस्वीर से लिपटकर कल बहूत देर तक रोया था मैं

तुम्हारी तस्वीर को आज अपने साथ ही जला रहा हूँ मैं

तुम्हारी तस्वीर को आज अपने साथ ही जला रहा हूँ मैं 

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‘श्वान’

किंवाड के खुलने की आवाज और किसी की आहट

आँखें लगाए रखी है अपने आँगन में..तुम आओगी कभी तो.

हालांकि तुम कह के गयी थी कभी न आने का

मगर एक आस,एक उम्मीद,एक भरोसा

ठीक वैसे ही जैसे मोर सर उठाए झांकता है

के आसमान की छलनी से छन के आएगी बारिश

दूर जब कोई रेत का बवंडर उठता है मुझको लगता है

तुम धो रही हो खुदको मेरी मिट्टी से

तुम आओगी न! भरोसा न दो तो दिलासा दे दो

शायद तुम्हे भी अब मेरी प्रीत का भान हो गया हो

मुझे तुम मोर न समझो तो समझ लेना वो “श्वान”

जो उस चौखट पर आता है जहाँ से उसे दुत्कार देते है रोज

बस इसी उम्मीद के साथ की आज

शायद इस घर का मालिक इंसान हो गया हो