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“Break-Up”

1.बहुत मायूस है वो भी मुझे मालूम है लेकिन
उसकी बदगुमानी उसको कुछ कहने नहीं देती

2.उसको है ये गुमान के उसे मिल जायेंगे बहुत से
मुझको है ये यकीन कोई भी मुझसा न मिलेगा…

3.अकेलापन उदासी और बैचेनी उमर भर की
मोहब्बत छोड़ जाती है जब भी हमको छोड़ जाती है

4.बातो-बातो में ही सही कह दिया उसने
इश्क नहीं “अहसान” किया था तुम पर

5.इश्क़ फिर से अब नहीं होगा
हुस्न तेरा असर नहीं होगा
नींद ली है तो जान भी ले ले
जागकर तो गुजर नहीं होगा

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“इश्क”

1.इश्क गर “गुनाह” है दुनिया में
तो मैं शहंशाह हूँ गुनाहो का
2. हां मैं बेचता हूँ इश्क, खरीदोगे तो ये सुन लो
वफ़ा का दाम है और बाज़ार मेरे दिल में लगा है

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“अना”

आज के दौर में लोगों के जीने के तरीके पे लिखा गया व्यंग्य:-

“अना को मार दे लावरिशों की लाश हो जा
या खद्दर ओढ़ ले तू भी गधों में ख़ास हो जा
जिसकी बेटियां तो मौज करती सासरे में
और बहुएं रोज रोती है तू वैसी सास हो जा”

अना:-स्वाभिमान