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“रूदाली”

चाँद ने आहे भरी और चाँदनी ने मुंह ढँका
जब गया वो छोड़ के राते “रूदाली”हो गयी
इस शहर की एक पुरानी बावड़ी सी ज़िन्दगी
गर्त तक सुखी ही थी कुछ और खाली हो गयी
जब वो मेरे साथ था कालिख में भी चमकार थी
अब जो वो मेरा नहीं सुबहें भी काली हो गयी
हिज्र के बारूद पर ज़िन्दगी पल-पल जली
खून की होली हुई औं साँसे दीवाली हो गयी
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“कुछ तो दे”

मुसाफिर हूँ चिंगारी कोई दीया या आफताब
कुछ तो दे
तू कर मेरे खर्चो का हिसाब या हाँ का जवाब
कुछ तो दे

मैं तेरी दुनिया में बस भटकने के लिए नहीं आया
नज़र की तितलियाँ,अब्र-ए-गेसू ,लबो का गुलाब
कुछ तो दे

तुझे गुमाँ है गर अपने बदन की कैफियत पर
मैं प्यासा हूँ मुझे कोई दरिया या कतरा-ए-शराब
कुछ तो दे

सुना है तू सीखाता है सलीके इश्क के सबको
अनाडी हूँ मुझे भी कोई सफ़हा,सलाह या किताब
कुछ तो दे

यूँ ही एक रोज खामोश तुझसे दूर चला जाउँगा
कद्र कर मेरी कभी झिड़कन,गाली कभी आदाब
कुछ तो दे

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“पीड़ा का यौवन”

मुझमें पीड़ा का यौवन है

ये आँखे अश्रु से धुलकर चमकी है
इन गालो पे टीस से उठती लाली है
मेरे मन में कोई बूढ़ा बैठा है लेकिन
मेरी सब बातो में फिर भी बचपन है

इन बालो में गुजरे दौर की कालिख है
इन पैरो में ठोकर खा कर फुर्ती है
मेरी पलकों पर सावन है बरसो से
मेरे अंतस में फिर भी सुखापन है