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“अवधेश”

इस बरस जनवरी में मैंने अपने आठ वर्षीय भांजे ‘अवधेश’ को खोया,पीड़ा का कोई पार नहीं है।यूँही बैठे-बैठे बन पड़ी ये क्षणिका उसे समर्पित करते हुए…पोस्ट कर रहा हूँ।

अजीब जिद थी, अजीब आदत
के तुम हाथ में लेकर हर एक चीज फेंक देते थे
तुम्हें आठ बरस तक संभाले रखा था हमनें
“अवधेश”
ज़िन्दगी को भी कोई यूँ फेंकता है क्या
एक बार देखते तो सही
पीछे बहुत से लोग बैठे है तुम्हारे अपने
सुनो!बहुत जोर की लगी है हमारे सीने पे
घाव ऐसा की बीसियों मरहम भी न भर सकेंगे जिसे
टीस ऐसी की हर एक रोज बढ़ती जायेगी
भरोसा रखो अब तुम्हे कुछ भी नहीं कहेंगे हम
न कभी डाटेंगे न छेड़ेंगे न रुलायेंगे तुम्हें
तुम तो बच्चे हो कोई भी बात बना लोगे तुम
थोडा हंस के थोडा रो के सब को मना लोगे तुम
लौटने का वादा किया था तुमने,निभाओ ना
“मौत” को दिखा कर ठेंगा फिर से चले आओ ना
“मौत” को दिखा कर ठेंगा फिर से चले आओ ना

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“नफरत”

तुम मोहब्बत की बात करते हो
हमने नफरतों में धोखे खाये है
उम्र भर जिससे दुश्मनी रखी,गालियां दी जिसे
आज
उसको चूमा है
उससे लिपटे है
जी भर के रोके आये है

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“यार”

वो जो चलता है तो मचलती है जमाने की हया
वो जो हँसता है तो खुदा साथ-साथ हँसता है
एक तो मैं हूँ जो की लफ़्ज़ों की मुफलिसी में हूँ
और एक वो है जो निगाहों से बात करता है

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“बैक-डेट”

अलग होने के बाद रोहन ने कहा “आखिरी बार मुझे तुमसे एक ‘किस’ चाहिए”
स्वेता बोली “अब जब हममें कोई रिश्ता ही नहीं तो फिर ‘किस’ क्यों।
“कोई बात नहीं बैक-डेट में लिख देना” लड़का बडबडाया…
स्वेता को याद आया के बस ऐसी बातो के लिए ही तो वो रोहन को चाहती थी।
और फिर दोनों एक दूसरे को मुद्दतों तक चूमते रहे।

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“तू”

1.तू जो होता तो हर ख़ुशी होती
जिंदगी मेरी जिंदगी होती
रात होती,न रतजगे होते
शाम होती,न मयकशी होती

2.तू जो चाहे वो ही मैं चाहूँ,
तू न चाहे जो भी मैं चाहूँ
मेरी खुशियों से ही नहीं तू वाबस्ता
फिर भला क्यूँ तुझको मैं चाहूँ

3.मेरे तसव्वुर में गर तू नहीं होता
जो आज हूँ मैं वो मैं नहीं होता

4.मुद्दतो से तुझे नहीं देखा
मुद्दतों से मैं नहीं सोया

5.आज फिर आँखों ने समंदर उगला
आज फिर बहुत याद आये तुम