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“क्या फूटपाथो पे सोये हो?”

तुम बँगले में रहते हो,तुम मखमल पे सोते हो
तुम गाडी में फिरते हो,तो आखिर क्यों रोते हो
फिर किस बात का दर्द तुम्हें है,फिर क्यों आँख भिगोये हो
एक बात कहुँ,सच बोलोगे! क्या फूटपाथो पे सोये हो?

क्या सर्दी की तलवारों से जान उधड़ते देखी है?
क्या सावन की बरसातों में सांस उखड़ते देखी है?
क्या गर्मी की भट्टी में तुमने भी जिस्म जलाया है?
क्या अपने बच्चों की खातिर बासी खाना लाया है?
फिर किस बात का दर्द तुम्हें है,फिर क्यों आँख भिगोये हो
एक बात कहुँ,सच बोलोगे! क्या फूटपाथो पे सोये हो?

क्या बेटी के तन से लिपटी गिद्ध निगाहें देखी है?
क्या पीड़ा में स्याह हुई बीवी की बाँहे देखी है?
क्या तुमने बुड्ढी माँ को झूठी बातों से बहलाया है?
क्या अपने बापू से अपना जख्मी हाथ छुपाया है?
गर नहीं किया तो कब हारे, कब टूटे, कब रोये हो?
एक बात कहुँ,सच बोलोगे! क्या फूटपाथो पे सोये हो?

क्या तुमको अपने बिस्तर में आकर मार गया कोई
क्या बेटे की लाश समेटी या खून की दीवारे धोई
क्या मुफ़लिस होने की खातिर तुमने गाली खाई है
क्या कोई अपना खोया और जान की कीमत पाई है
क्या कचहरियों में पाँव घिसे है आस के पत्थर ढोये हो?
एक बात कहुँ,सच बोलोगे! क्या फूटपाथो पे सोये हो?

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“अच्छी नस्लें”

मुझको,मरने के बाद पढ़ेंगे
मेरी इज़्ज़त के लिए लड़ेंगे
ज़िंदा को जुते मारेंगे
और मुर्दे पर फूल चढ़ेंगे
खुशियां, शोहरत बस अपनी हो
दूजे की कहाँ सुहाती है
इस दुनिया को “अच्छी नस्लें”
बस तस्वीरों में भाती है

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“मेरी दुल्हन,मेरी कविता”

मेरा मन जितना प्यार करे
ये भावो से साकार करे
फिर शब्दो का सिणगार बना
नस नस पे मीठा वार करे
रस की छलकाती गगरी जब
लगती है ये पणिहारिन सी
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
बन कर के कोई क्षत्राणी,ये दुष्टो का संहार करे
नयनो को ढाल बनाए फिर पलको को तलवार करे
पहने मुण्डो की माला जब
बन जाती समर भवानी सी
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
तन से पुरी मधुशाला है,मन से ये भोली बाला है
केशो मेँ अंधियारा रातो सा चेहरे पर गजब उजाला है
होँठो का तिल मानो करता हो चुंबन की अगवानी सी
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
मिसरी सी मीठी बोली है,संग रखती स्नेह की झोली है
इसके पहलु मेँ हर सांझ दीवाली, हर रोज सवेरे होली है
बासंती रंगो मेँ लगती है ये कोई मदमस्त जवानी सी
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
रुठे तो नादान लगे,उसकी प्रीती एहसान लगे
मैँ सहज सरल सा मानव हुँ वो अवतारी भगवान लगे
मै राम हुँ तो वो शबरी है
हुँ किशन तो मीरा दीवानी सी
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
मेरी दुल्हन, मेरी कविता
#WorldPoetryDay
#PoetryAsBride

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“Digital Publication”

एक कोशिश की है इंटरनेट की दुनिया पर शब्दों का स्टॉल खोलने की…सभी दोस्त जो Instagram  का उपयोग करते है…मेरे इस पेज से जरूर जुड़े…अपनी कविताएं मुझे DM करे…मैं उन्हें इस पेज पर प्रकाशित करूँगा…जो लोग Instagram का उपयोग नहीं करते..वो मुझे mail (dheerajdave29@gmail.com)करे..मैं उनकी रचनाओं को इस पेज पर जगह दूंगा…इस पेज के द्वारा आप दुनिया के उन लोगो तक जुड़ पाएंगे जो लिखना पसन्द नहीं करते लेकिन पढ़ना जिनका जूनून है। सभी बुद्धिजीवियों का सहयोग अपेक्षित है।लिंक नीचे दे रहा हूँ🙏🙏🙏

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“मैं अकेला हूँ”

कई बार यूँ भी होता है के
आसमाँ की तरफ देखकर
चीखने को जी करता है
ये कहने को की बस
एक तुम ही नहीं हो जिसने
मुकम्मल किया है मुहब्ब्त को
मैं भी हूँ जो सह रहा हूँ
अंजाम-ए-वफ़ा
खिलखिलाए हुऐ हो गयी मुद्दत
गुनगुनाये हुए भी ज़माना हुआ
मेरे कमरे में मेरी सांस पड़ी रहती है
ये जो शहर में घुमे है
ये जनाजा है मेरा
मेरी नज्मो में मेरे जज्ब दबे रहते है
इन निगाहों में एक जान रोज डूबे है
ये परिंदों के जोड़े मुझे चिढ़ाते है
और मुझसे मिलने तो
मेरे अपने भी नहीं आते है
गर बदगुमाँ है तू
तेरी निबाह तेरी हालत पर
तो सुन ले
मैं भी कोई शहंशाह-ए-कायनात नहीं
किसी खूबसूरत जंगल में ज्यूँ
कोई ठूंठ खड़ा होता है
किताबों की दुकानों में
सड़े है ज्यूँ अदब के पन्ने
ठीक वैसे ही
एक रवायत सी निभाता हूँ मैं
तुम्हारे बाद कोई नहीं मेरा
“मैं अकेला हूँ”
बस एक रस्म है जीने की
जो जिए जाता हूँ मैं

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बीमार

ये सितारे यूँ ही घूमते-घूमते 
तेरे शहर भी आते होंगे न
टहलते होंगे तेरी छत पर
ठहरते होंगे तेरी गली में
झांकते होंगे तुम्हारी खिडकीयों से
और देखते होंगे तुम्हे 
पल्लू ख़सूटे हुए अपनी रसोई में 
भागते हुए अपने रिश्तों के पीछे
देखते होंगे शायद तुम्हें सँवरते हुए
ये सितारे फिर आकर 
मुझे चिढ़ाते है मुझसे कहते है की 
एक तू ही परेशाँ है बस
वो तो खुश है तेरे बिना भी
मगर मुझको अब भी ये गलतफहमी है
के मैं तुम्हारे बिस्तर की सलवटें न सही
लेकिन तुम्हारे तकियों में 
छुपी हुई नमी तो हूँ
सुना है मैंने अक्सर 
अपनी सहेलियों से
मेरा ज़िक्र करती हो तुम
मेरी तबियत मेरी नौकरी 
मेरी बहने मेरे माँ-बाप
हो कोई भी बहाना चाहे मगर
मेरी फ़िक्र करती हो तुम
एक पागल के लिए यही काफी है
के तुम्हें याद हूँ मैं
तुम्हारे माथे का सिन्दूर न सही
तुम्हारें होंठो की कंपकपाहट हूँ मैं
कोई हिचकी हूँ कोई सपना हूँ
कोई आहट हूँ मैं
तुम्हारा भरोसा तुम्हारा गुमान न सही 
तुम्हारी हिचकिचाहट हूँ मैं
तुम्हारे बाद यूँ तो 
कुछ नहीं बदला लेकिन
मेरी नज़्में अधूरी,गज़लें बेहिस
और जज्ब बेकार लगता है
बहुत रंगीनियाँ है यूँ तो कहने को 
मगर मुझको तो 
पूरा शहर बीमार लगता है