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“पत्थर”

उसके हाथ में जब भी कोई पत्थर थमाता है
जाने क्यूँ वो उस पत्थर को मुझपे ही उठाता है

मैं जब भी देखता हूँ अपनी रोती हुई सूरत

मेरा आईना ही है जो मुझको तब हंसाता है

मुद्दत हुई अब तक हमारा रिश्ता नहीं टूटा

रातो में अक्सर वो मुझे मिलने को आता है

नहीं मालूम मुझको फर्क हिन्दू और मुसलमाँ में

मेरी खातिर दीवाली पे पटाखे मोमिन लाता है

फकत अफवाह है के कोई खुदा उस पार बैठा है

ये दुनिया मतलबो की है इसे इंसाँ चलाता है

सुना ही था मगर मुझको समझ में आज आया है

के इंसाँ टूट जाता है जब किसी से दिल लगाता है

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“यूँ ही”

कक्षा 8-9 का वह दौर जब मैं फकत तुकबंदियां किया करता था…आज कई दिनों बाद घर पहुँचा तो एक किताब के पिछले पन्नों में अपनी ग़ज़ल मिली,सोचा आपके साथ बांटी जाए।

दाग-ए-उल्फत तो रह जाएंगे उम्रभर यूँ ही
ज़िन्दगी फिर भी हो जायेगी बसर यूँ ही

टीस कितनी भी हो पर नूर न गुम हो अपना
चोट खा कर के निखर जाते है पत्थर यूँ ही

लाजिमी है की यहाँ इश्क ही मिटता है सदा
हुस्न को कहते नहीं लोग सितमगर यूँ ही

ज़िस्म देखो ज़रा मेरे इन जख्मो को छुओ
मैंने झेले थे कभी पीठ में खंजर यूँ ही

वक्त फानी है कब एक सा रहता है भला
ये महल थे कभी अब हो गए खँडहर यूँ ही

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“झूठ”

ये जो लोग दिखाई देते है तुम्हें रंगीन सूट-बूट में
सैंकडों बून्द खून पी जाते है ये बस एक घूंट में

अकाल पड़ने पर ये भेजते है तुम्हें दाना-पानी
और खुद शरीक हो जाते हैे बादलो की लूट में

क्या गज़ब है के करोड़ो खर्चते निज श्वान पर
और हाथ में चाँदी का खप्पर ले खड़े है छूट में

सांस की इज़्ज़त नहीं न जान की चिंता इन्हे
लाश पे सेंके है रोटी और खेलते है ये फूट में

ओ गरीबो! अब तो अपने आप की परवाह करो
क्यूँ इन्हें अपना समझकर जी रहे हो झूठ में