Art

“Random-Thoughts”


Advertisements
Art

“मसीहा”

इश्क में मुझको खुदा करने वाले
जिस दिन भी मैं खुदा हो जाऊँगा
तुम्हारी जुबाँ में बेवफा हो जाऊंगा
खुदा किसी एक का नहीं होता
खुदा यूँ तो सबका होता है मगर
वक्त पड़ने पे किसी का नहीं होता
न जज्बात न यादो की कदर होती है
उसकी तो फकत नीयत पे नजर होती है
तेरे हँसने पे न कभी उसको नशा होगा
तेरे रोने पे न आएगा वो कंधा लेकर
वो खुदा है बहुत काम है उसको पगली
किसी को ख़त्म करना है
किसी में जान भरनी है
सबको दिन दिखाना है
और फिर रात करनी है
तेरे पहलु की खातिर वो सितारे भी नहीं देगा
तेरी आँखों की खातिर वो नज़ारे भी नहीं देगा
ले मेरी बात मान तू मुझको बस इंसान रहने दे
कभी चूमे कभी लिपटे कभी झगडे कभी रोये
खुदाओं के नसीबो में कहाँ ये बात होती है
के कोई राह तकता है मोहब्बत साथ होती है
हम इंसान है हमको हज़ारो गलतियां है माफ़
खुदा होते ही बंदिश है की दामन को रखो साफ़
खुदा होते है जो फिर वो कभी बूढ़े नहीं होते
जब बूढ़े ही नहीं होते तो मोहब्बत भी भटकती है
हम इंसान है तो इश्क का अंजाम देखेंगे
जवाँ सूरज को देखा है तो बुढ़िया शाम देखेंगे
खुदाओं के लिए पूजा-अजाने कौन बोलेगा
रातो की थकन होगी के मंदिर कौन खोलेगा
सुन पगली ये बाते छोड़, इश्क आसान रहने दे
मसीहा मत बना मुझको फकत इंसान रहने द