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“ज्योतिष”

 अगर आप किसी पीड़ा में है और थोडा-बहुत ज्योतिष में विश्वास रखते है तो आज मैं हर राशि के लिए किस वार को व्रत करना है और कौनसा रत्न पहनना है की जानकारी दे रहा हूँ,उचित लगे तो जरूर व्यवहार में लाये।

ज्योतिष एक पारंपरिक भारतीय विज्ञान है जिसका लोहा पूरा विश्व मानता है
राशि                   राशि स्वामी                रत्न
1.मेष और वृश्चिक      मंगलवार                 मूंगा
2.वृषभ और तुला       शुक्रवार                  हीरा
3.मिथुन और कन्या      बुधवार                   पन्ना
4.कर्क                       सोमवार                  मोती
5.सिंह                       रविवार                   माणक
6.धनु और मीन           गुरुवार                   पुखराज
7.मकर और कुम्भ      शनिवार                   नीलम
इसके अलावा राहु की दशा हो तो गोमेद और केतु के लिए लहसुनिया दोनों ही ग्रहों का प्रभाव समाप्त करने के लिए बुधवार का उपवास स्वयंसिद्ध है।आप कुछ और पूछना चाहे तो “स्वागत” है।

“स्वस्ति”

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“मृत्युभोज/श्राद्ध औऱ मनुस्मृति”

मेरा यह ब्लॉग वैसे तो मेरी कविताओं और कहानियाँ कहने का माध्यम है लेकिन कभी-कभी मुझे मेरे मन की और भी कुछ बातो को बांटने का जी करता है तो वो भी कर लेता हूँ ,जहां दिल से मैं एक लेखक हूँ वही कर्म से एक ब्राह्मण भी और अक्सर अपने घर में सम्हाल के रखे हुए कुछ ग्रन्थ या फिर इंटरनेट पर उपलब्ध पुस्तकें पढ़ता रहता हूँ।    मनुस्मृति के बारे में हमारे देश में बहुत सारी भ्रांतियां है लेकिन सही मायनो में इसे पढ़ा जाये तो ये हमारे समाज के हर वर्ण के नैतिक मूल्यों के बारे में भी बात करती है।

इस ग्रन्थ ने समाज के हर तबके को चरित्रवान बनाने पर भी जोर दिया,हो सकता है इसकी सारे बातें आज के दौर में प्रासंगिक न हो लेकिन इसकी उपयोगिता को सिरे से नकारा नहीं जा सकता।वे लोग जो फिलवक्त के कुछ लेखको की किताबे पढ़कर बुद्धिजीविता का ढिंढोरा पीटते है उन्हें मैं केवल एक तर्क देना चाहूँगा,की जिनकी किताबें पढ़कर आप मनुवाद के विरोधी हो जाते है वो लेखक लोगो की स्मृति में 50 साल भी नहीं रहते और ये ग्रन्थ जो पिछले हज़ारो वर्षो से लोगो की स्मृति में बसे है ये एक बात ही काफी है इनकी महानता को साबित करने के लिए ये ग्रन्थ अटल और सनातन है और पॉकेट बुक्स की उन बुद्धिजीवियों की किताबे महज बरसाती मेंढक।

             सभी भूमिकाओं को परे रखते हुए आज समाज में फैली एक कुरीति की बात कर रहा हूँ जिसका मनुस्मृति ने हज़ारों बरसो पहले विरोध कर लिया था लेकिन हम लोगो ने इसे अभी तक अपना रखा है सही मायनों में हम वो लोग है जो रीति-रिवाज,प्रथा-परम्परा का चयन भी अपनी सुविधा,वैभव और दिखावे के नाम पर करते है।

     आज मैं आपके साथ मृत्युभोज/श्राद्ध की बात कर रहा हूँ वैसे मैं इतना ज्ञानी तो नहीं की आप पर अपना प्रभाव जता सकुं लेकिन जब हमारे देश में लोग अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देशद्रोह कर सकते है तो मैं तो महज अपने धर्म की एक रीति का विश्लेषण कर रहा हूँ।

      इंसान की मृत्युं के बाद 10 दिन तक जो दैनिक श्राद्ध होता है उसे “नव श्राद्ध” ग्यारहवे दिन का श्राद्ध”नव मिश्र श्राद्ध” और बाहरवें का श्राद्ध “सपिण्डी श्राद्ध” कहलाता है ऐसा कहा जाता है इन सब कर्मो के बाद मृतक प्रेत योनि से छूटकर देव योनि में जाता है।मृत्युं के बारह महीने बाद उसी तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है उसे पार्वण श्राद्ध कहते है उसी तिथि को हर वर्ष जो क्रिया की जाती है उसे “संवत्सरी”और हर वर्ष कन्याचलित सूर्य अर्थात् आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में किया जाने वाला कर्म कनागत या श्राद्ध कहलाता है। कनागत भाद्रपद की पूर्णिमा से लेकर आश्विन की अमावस्या तक अर्थात् 16 दिन तक चलते है।पितृ कर्म के अलावा देव कर्म में भी एक श्राद्ध किया जाता है जिसे नान्दी श्राद्ध कहते है।ये शब्द अक्सर अपने आस-पास होने वाली बड़ी-बड़ी देव प्रतिष्ठाओं और धार्मिक आयोजनों में सुना होगा।

                      श्राद्ध करना इंसान की श्रद्धा का विषय है लेकिन कई लोग इसे एक ढोँग भी मानते है,उनके हिसाब से मौत के बाद कौन देखता है की हमने मृतात्मा के लिए क्या किया? उन विद्वानोँ से मैं कहना चाहूँगा की हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करता है और ये एक आत्मावादी धर्म है।हमें पितृ ऋण से मुक्ति प्राप्त करने के लिए श्राद्ध करना ही होता है,सच कहा जाये तो ये संतति का कर्तव्य है की हम अपने पितरो के नाम से ये कर्म करे।

              अब सब बात छोड़ के मुख्य विषय पर आता हूँ,हमारे समाज में ऐसे हज़ारो लोग है जो ताउम्र अपने माँ-बाप की न देखभाल करते है,न उन्हें खाने को पूछते है और न ही उनके पास बैठकर 2 मिनट बात भी करते है वे लोग सिर्फ पैसे कमाने में, रंगरलियों में और अपना ओहदा संभालने में ही अपनी उम्र गुजार देते है लेकिन जैसे ही उनके घर में माँ या पिता की मृत्यूँ होती है वो दुनिया के सबसे धार्मिक,आज्ञाकारी और सुलभ व्यक्तित्व बन जाते है,यही से मनुस्मृति अपना काम शुरू करती है।

             आप लोग अक्सर देखते होंगे की कई जगह अपने पितरो की आत्मा की शांति के लिए अमीर लोग हज़ारों लोगो का खाना रहते है,सही मायनो में ये धन का अपव्यय है और धर्म का मज़ाक है।मनुस्मृति के अनुसार श्राद्ध में केवल वेदपाठी ब्राह्मणों को ही कव्य करने का हक़ है।वेद पाठी ब्राह्मण से तात्पर्य उस ब्राह्मण से है जो कम से कम एक छोटा सा यज्ञ करवाना तो जानता हो।


अगर आपके यहाँ श्राद्ध में कोई अयोग्य ब्राह्मण कव्य लेता है उसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ता है।
         श्राद्ध के जरिये आप अपने रिश्तेदारो को और मित्रो को खुश करने का काम नहीं कर सकते,इसके लिए और भी कई शुभ काम हमारे घरों में आयोजित होते है।सही मायनो में मित्र या रिश्तेदार श्राद्ध के निमित्त भोजन के योग्य नहीं है और अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो इससे जिसके लिए आपने श्राद्ध रखा है वह आत्मा विचलित होती है। श्राद्ध में 2-3-5-7 या अधिकतम 11 ब्राह्मणों को ही भोजन करवाये इससे ज्यादा को भोजन करवाना और अपनी अमीरी का दम्भ भरने से मनुस्मृति अनुसार यजमान को आग के गोले निगलने पड़ते है।

                निष्कर्षतः केवल यह कहना चाहूँगा की अगर आपकी कुंडली में पितृ दोष या मातृ दोष है तो आप चान्द्रमास की हर अमावस्या को एक ब्राह्मण भोजन के साथ ही सही लेकिन श्राद्ध जरूर करे इसके अलावा हर हिन्दू को अपने पितरो के लिए श्राद्ध करना चाहिए इससे हम पितृ ऋण से मुक्त होते है और हमारी संतति बलवान,तेजस्वी और कुशाग्र होती है।मृत्यु भोज या श्राद्ध निमित्त होने वाले भोजनो का कभी समर्थन न करे,श्राद्ध सूक्ष्म रूप से एकांत में होने वाली क्रिया है इसका कभी दिखावा न करे,ये परिवारिक सुख और समृद्धि के लिए किया जाता है न की दिखावे के लिए।

      “स्वस्ति”

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hum dil de chuke sanam by me

आज एक स्नेही ने सलाह दी की smule join कीजिये,मैंने किया और वही अपनी पहली रिकॉर्डिंग भी की,उम्मीद है आपको पसन्द आएगी।मेरे साथ वाली मोहतरमा तो बेहतरीन है,मैंने थोडा बहूत अच्छा करने की कोशीश की।

इस पोस्ट पर केवल आपके like नहीं विचार भी आमंत्रित है जरूर दीजियेगा और हाँ बहुत शुक्रिया “कोमल” इतने अच्छे प्लेटफॉर्म के बारे में जानकारी देने के लिए😊😊

I found this awesome recording of “Hum Dil De Chuke Sanam – Title Track!!” on #Smule: http://www.smule.com/p/1088384781_1346938447 #SingKaraoke

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“Erotica”

Erotica लिखने के लिए महज नंगी तस्वीरों की जरुरत नहीं होती,कई बार आपके अहसास ही काफी होते है।

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“प्यारे”

Zigolo पसन्द करने वाली महिलाओं और वेश्यागमन करने वाले पुरुषों के लिए ये रचना,थोड़ी सी कड़वी है मगर सच है।पति और जिगोलो एवं पत्नी और वेश्या में फर्क बताती मेरी ये रचना:-

हाँ उसमें भी जान है प्यारे,हाँ उसको भी कुछ होता है
हाँ उसमे भी दर्द उठे है,हाँ उसका भी दिल रोता है

तू क्या समझे तू क्या जाने शख्स नहीं वो बाजारों का
वो मंदिर का फूल है प्यारे,तू तो कीचड में सोता है

तू गाली सा गूंगापन है और वो एक पुराण है प्यारे
तुझमे प्रीत की बून्द नही है वो पूरा सागर ढोता है

वो सब कुछ देकर भी खुश है और तू भूखो सा रोवे है
उसने खोकर कुछ न खोया तू सब पाकर के खोता है

तू तो अदना सा जुगनू है वो जलता सूरज अम्बर का
तुझसे तो बस दिल बहले है उससे पूरा दिन होता है

उसका संग तीरथ की पूजा, तेरा छूना सूतक है
वो मेरे पितरो का पुण है,तू तो घर में विष बोता है

 

 

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“बदलना”

बदलना उसकी आदत है फिर भी न जाने क्यूँ
कई बार वो बदला मगर ये आदत नहीं बदली

कोई पंजा हो कमल हो चाहे हाथों में हो झाड़ू
फकत चेहरे ही बदले है ये सियासत नहीं बदली

जरुरी है मरेगा इश्क ही हुस्न तो आबाद रहेगा
ज़माने गुजर गए मगर ये रवायत नहीं बदली

मेरी गलतियां मेरे झूठ मेरे शिकवे मेरी रंजिश
बदला सभी पर तुझसे मेरी उल्फत नहीं बदली

मजहबो के नाम पर मैंने हर जगह सजदे किये
बदला मेरा खुदा मगर मेरी इबादत नहीं बदली