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“मृत्युभोज/श्राद्ध औऱ मनुस्मृति”

मेरा यह ब्लॉग वैसे तो मेरी कविताओं और कहानियाँ कहने का माध्यम है लेकिन कभी-कभी मुझे मेरे मन की और भी कुछ बातो को बांटने का जी करता है तो वो भी कर लेता हूँ ,जहां दिल से मैं एक लेखक हूँ वही कर्म से एक ब्राह्मण भी और अक्सर अपने घर में सम्हाल के रखे हुए कुछ ग्रन्थ या फिर इंटरनेट पर उपलब्ध पुस्तकें पढ़ता रहता हूँ।    मनुस्मृति के बारे में हमारे देश में बहुत सारी भ्रांतियां है लेकिन सही मायनो में इसे पढ़ा जाये तो ये हमारे समाज के हर वर्ण के नैतिक मूल्यों के बारे में भी बात करती है।

इस ग्रन्थ ने समाज के हर तबके को चरित्रवान बनाने पर भी जोर दिया,हो सकता है इसकी सारे बातें आज के दौर में प्रासंगिक न हो लेकिन इसकी उपयोगिता को सिरे से नकारा नहीं जा सकता।वे लोग जो फिलवक्त के कुछ लेखको की किताबे पढ़कर बुद्धिजीविता का ढिंढोरा पीटते है उन्हें मैं केवल एक तर्क देना चाहूँगा,की जिनकी किताबें पढ़कर आप मनुवाद के विरोधी हो जाते है वो लेखक लोगो की स्मृति में 50 साल भी नहीं रहते और ये ग्रन्थ जो पिछले हज़ारो वर्षो से लोगो की स्मृति में बसे है ये एक बात ही काफी है इनकी महानता को साबित करने के लिए ये ग्रन्थ अटल और सनातन है और पॉकेट बुक्स की उन बुद्धिजीवियों की किताबे महज बरसाती मेंढक।

             सभी भूमिकाओं को परे रखते हुए आज समाज में फैली एक कुरीति की बात कर रहा हूँ जिसका मनुस्मृति ने हज़ारों बरसो पहले विरोध कर लिया था लेकिन हम लोगो ने इसे अभी तक अपना रखा है सही मायनों में हम वो लोग है जो रीति-रिवाज,प्रथा-परम्परा का चयन भी अपनी सुविधा,वैभव और दिखावे के नाम पर करते है।

     आज मैं आपके साथ मृत्युभोज/श्राद्ध की बात कर रहा हूँ वैसे मैं इतना ज्ञानी तो नहीं की आप पर अपना प्रभाव जता सकुं लेकिन जब हमारे देश में लोग अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देशद्रोह कर सकते है तो मैं तो महज अपने धर्म की एक रीति का विश्लेषण कर रहा हूँ।

      इंसान की मृत्युं के बाद 10 दिन तक जो दैनिक श्राद्ध होता है उसे “नव श्राद्ध” ग्यारहवे दिन का श्राद्ध”नव मिश्र श्राद्ध” और बाहरवें का श्राद्ध “सपिण्डी श्राद्ध” कहलाता है ऐसा कहा जाता है इन सब कर्मो के बाद मृतक प्रेत योनि से छूटकर देव योनि में जाता है।मृत्युं के बारह महीने बाद उसी तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है उसे पार्वण श्राद्ध कहते है उसी तिथि को हर वर्ष जो क्रिया की जाती है उसे “संवत्सरी”और हर वर्ष कन्याचलित सूर्य अर्थात् आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में किया जाने वाला कर्म कनागत या श्राद्ध कहलाता है। कनागत भाद्रपद की पूर्णिमा से लेकर आश्विन की अमावस्या तक अर्थात् 16 दिन तक चलते है।पितृ कर्म के अलावा देव कर्म में भी एक श्राद्ध किया जाता है जिसे नान्दी श्राद्ध कहते है।ये शब्द अक्सर अपने आस-पास होने वाली बड़ी-बड़ी देव प्रतिष्ठाओं और धार्मिक आयोजनों में सुना होगा।

                      श्राद्ध करना इंसान की श्रद्धा का विषय है लेकिन कई लोग इसे एक ढोँग भी मानते है,उनके हिसाब से मौत के बाद कौन देखता है की हमने मृतात्मा के लिए क्या किया? उन विद्वानोँ से मैं कहना चाहूँगा की हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करता है और ये एक आत्मावादी धर्म है।हमें पितृ ऋण से मुक्ति प्राप्त करने के लिए श्राद्ध करना ही होता है,सच कहा जाये तो ये संतति का कर्तव्य है की हम अपने पितरो के नाम से ये कर्म करे।

              अब सब बात छोड़ के मुख्य विषय पर आता हूँ,हमारे समाज में ऐसे हज़ारो लोग है जो ताउम्र अपने माँ-बाप की न देखभाल करते है,न उन्हें खाने को पूछते है और न ही उनके पास बैठकर 2 मिनट बात भी करते है वे लोग सिर्फ पैसे कमाने में, रंगरलियों में और अपना ओहदा संभालने में ही अपनी उम्र गुजार देते है लेकिन जैसे ही उनके घर में माँ या पिता की मृत्यूँ होती है वो दुनिया के सबसे धार्मिक,आज्ञाकारी और सुलभ व्यक्तित्व बन जाते है,यही से मनुस्मृति अपना काम शुरू करती है।

             आप लोग अक्सर देखते होंगे की कई जगह अपने पितरो की आत्मा की शांति के लिए अमीर लोग हज़ारों लोगो का खाना रहते है,सही मायनो में ये धन का अपव्यय है और धर्म का मज़ाक है।मनुस्मृति के अनुसार श्राद्ध में केवल वेदपाठी ब्राह्मणों को ही कव्य करने का हक़ है।वेद पाठी ब्राह्मण से तात्पर्य उस ब्राह्मण से है जो कम से कम एक छोटा सा यज्ञ करवाना तो जानता हो।


अगर आपके यहाँ श्राद्ध में कोई अयोग्य ब्राह्मण कव्य लेता है उसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ता है।
         श्राद्ध के जरिये आप अपने रिश्तेदारो को और मित्रो को खुश करने का काम नहीं कर सकते,इसके लिए और भी कई शुभ काम हमारे घरों में आयोजित होते है।सही मायनो में मित्र या रिश्तेदार श्राद्ध के निमित्त भोजन के योग्य नहीं है और अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो इससे जिसके लिए आपने श्राद्ध रखा है वह आत्मा विचलित होती है। श्राद्ध में 2-3-5-7 या अधिकतम 11 ब्राह्मणों को ही भोजन करवाये इससे ज्यादा को भोजन करवाना और अपनी अमीरी का दम्भ भरने से मनुस्मृति अनुसार यजमान को आग के गोले निगलने पड़ते है।

                निष्कर्षतः केवल यह कहना चाहूँगा की अगर आपकी कुंडली में पितृ दोष या मातृ दोष है तो आप चान्द्रमास की हर अमावस्या को एक ब्राह्मण भोजन के साथ ही सही लेकिन श्राद्ध जरूर करे इसके अलावा हर हिन्दू को अपने पितरो के लिए श्राद्ध करना चाहिए इससे हम पितृ ऋण से मुक्त होते है और हमारी संतति बलवान,तेजस्वी और कुशाग्र होती है।मृत्यु भोज या श्राद्ध निमित्त होने वाले भोजनो का कभी समर्थन न करे,श्राद्ध सूक्ष्म रूप से एकांत में होने वाली क्रिया है इसका कभी दिखावा न करे,ये परिवारिक सुख और समृद्धि के लिए किया जाता है न की दिखावे के लिए।

      “स्वस्ति”

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15 thoughts on ““मृत्युभोज/श्राद्ध औऱ मनुस्मृति”

  1. हिन्दू धर्म की जटिल रीति के वैज्ञानिक व् तार्किक कारणों का अत्यन्त उम्दा वर्णन।

    महर्षि मनु ने सचमुच ही अपने ग्रन्थ से समाज को स्थायित्व प्रदान किया है। ऐसे ज्ञानी महापुरुष को कोटि कोटि नमन।

  2. Sorry भाई जी लेकिन मनुस्मृति में कहीं भी मृतक भोज या श्राद्ध का वर्णन नहीं है। ये सब गलत कुरीतियाँ हैं जो हमारे कुछ पेटू लोगों ने अपना पेट भरने के लिये बना रखी हैं, जिससे इनका पेट भरता रहे बस।
    किसी के घर में कोई मर गया, किसी का कोई बेहद चाहने वाला उसको छोड़कर चला गया वो इंसान वैसे ही दुखी हो जाता है और फिर हम उससे उम्मीद करें कि वो सारे समाज को 56 भोग खिलाये, क्या मजाक है ?

      1. आपने कहा वो सही है कि सबका पेट ऊपर वाला भरता है।
        आपने तस्वीरें डाली हैं वो आपके पास जो मनुस्मृति होगी उसकी तस्वीरें हैं। मेरे पास जो मनुस्मृति है उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है तो भाई अब मैं न होने की pic कहाँ से लाऊँ ?☺
        अब मुद्दे की बात पर आता हूँ। पुराने समय में हमारे देश में गुरुकुल प्रथा चलती थी जिसमे गुरु जी अपने शिष्यों को सारे वेद मौखिक रूप से समझाया करते थे और इस प्रकार से किताबें या ग्रन्थ लिखने का प्रचलन नहीं था। बाद में लोगों ने इस ज्ञान को लिखना और पांडुलिपि के रूप में सहेज कर रखना शुरू किया। उस समय तक भी आज कल की तरह copyright नही था। तो जिसने भी जो भी मन में आया वो अपने मन से मनुस्मृति में ठूंस दिया। अब तो ये भी पता चलना मुश्किल है कि कौन सा श्लोक महाराज मनु द्वारा लिखा गया है और कौन सा किसी और के द्वारा प्रक्षेपित है।
        इस समस्या का समाधान करने का प्रयास किया डॉ सुरेन्द्र जी ने। उन्होंने मनुस्मृति का अध्ययन करके महाराज मनु की लिखने की शैली के आधार पर पाया की मनुस्मृति में कई श्लोक हैं जो बाद में ठूंसे गये हैं जिनका वेदों से कोई मतलब ही नहीं है।
        अगर आप इस विषय में अध्ययन के इच्छुक हैं तो आप गोविन्दराम हासानंद जी की दूकान से ‘विशुद्ध मनुस्मृति’ पुस्तक मंगवा कर पढ़ सकते हैं। गोविन्दराम जी की दुकान नई दिल्ली में नई सड़क पर है। आप चाहें तो उनकी website से contact no ले सकते हैं।

      2. Ji shukriya…m jarur padhunga…aur bharat me vidwan bhi huae hai….agar manusmriti me aisa kuch nahi hai to shaddho se sambandhit shlok vedo me kaise uplabdh hai….aapne tym nikal ke meri post pdhi eske liye shukriya😊

      3. भाई जी वेदों में तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। वेदों की रचना मनुस्मृति से बहुत पहले ही हो गयी थी। जब वेदों में ऐसा कुछ है ही नहीं तो मनुस्मृति में कैसे हो सकता है। जो कुछ है वो बाद में प्रक्षेपित किया गया है।
        देखिये, कोई भी विद्वान् लेखक जब कोई रचना लिखता है तो उसमे सारी विषयवस्तु एक क्रम से लिखी जाती है और सभी जगहों पर लेखक की लेखनशैली एक सी ही पायी जाती है। आप मनुस्मृति का अध्ययन करते हुए पायेंगे कि कई स्थानों पर लेखनशैली बदल गयी है क्योंकि वो बाद में प्रक्षेपित हुए हैं।

      4. और यही बात वेदों के लिये भी है। वेदों में भी लोगों ने प्रक्षेपण किया है। किसी प्रकाशक ने कोई श्लोक जबरदस्ती ठूंस कर कोई वेद छाप दिया तो उसको सही थोड़े ही मान लिया जायेगा।
        और सबसे मुख्य बात वेद संस्कृत भाषा में लिखे गये हैं। आजकल हम लोगों को संस्कृत भाषा आती नही है इसलिये हम उसका हिंदी अनुवाद पढ़ लेते हैं। अब जो अनुवादक ने लिख दिया हम उसको ही सही मान लेते हैं जबकि सत्य कुछ और ही होता है। सबसे सरल उदाहरण बताता हूँ- हिन्दू धर्म में कितने देवता होते हैं ? सभी का जवाब होगा 33 करोड़। क्योंकि हमको किताबों में यही पढ़ाया जाता है जबकि वेदों में जो श्लोक है उसमे 33 कोटि के देवता बताये गये हैं। कोटि मतलब प्रकार होता है जिसको अविद्वानों ने कोटि मतलब करोड़ कर दिया है। अब आप बताइये 33 करोड़ देवताओं की पूजा करनी हो तो कैसे करोगे ? एक साल में तो 365 ही दिन होते हैं। आप कितने वर्ष तक एक एक देवता की पूजा करते रहोगे? ☺
        तो भाई जी ये सब असम्भव बातें हैं। अगर आप सत्य को जानने के इच्छुक हैं तो आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन कीजिये।

      5. इस सन्दर्भ में सबसे पहले आपको ऋषि दयानंद कृत ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पढ़नी चाहिये।

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