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“चँदा”

मायड़ भाषा राजस्थानी में लिखी हुई मेरी दूसरी रचना,इस बहाने कुछ लोगों की शिकायते दूर कर रहा हूँ जो कहते है “तुम राजस्थानी में क्यों नहीं लिखते?”

बहुत साल पहले जब मैंने लिखना शुरू किया था तब 16 साल के एक लड़के का आधीरात को चन्द्रमा से संवाद लिखा था जो कुछ यूँ था

“चाँद तू भी है अकेला और मैं भी हूँ अकेला
सो रहा है ये जगत् छोड कर सारा झमेला

जग रहे है अब हमीं बस क्यों न थोडा गुनगुनाये
चल विरह का गीत गाए,चल विरह का गीत गाए”

इस रचना का अगला भाग मेरे पास अब नहीं है(लापरवाही की वजह से खो गया है),मगर इसी से प्रेरणा लेकर लिखी हुई मेरी राजस्थानी की रचना “चँदा”।

“रे चंदा डागलियें ढब जा के पाणो अब के खोणो है
थारी मारी पीर सरीखी थारो मारो एक रोणो है

थु भी रात रखड़तो फिरतो मैं भी भीत भचेड़ा खाउँ
आँखड़लियां रो नीर सुखियों खुद रे हेत मरसिया गाउँ
इन कलजुग में प्रीत निभाणी अंधारे डोरो पोणो है
थारी मारी पीर सरीखी थारो मारो एक रोणो है

के तो मैं पंछिडो होतो यूँ ही उड़तो बन-बन फिरतो
के मैं फूल हज़ारी होतो मंदिर अर् देवरिये चढतो
ओ काई मिनख जमारो मलियो सारी उमर नरक धोनो है
थारी-मारी पीर सरीखी थारो मारो एक रोणो है

मीत मळे मोतीडा जैडो हिवड़ा री सीपी में राखूं
प्रेम हुवे गंगाजल जैडो नैन झुकाऊं रज-रज चाखूं
फेर भळे बळबळती कांबळ ओढ़ मसाणा में सोणो है
थारी-मारी पीर सरीखी थारो मारो एक रोणो है”

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12 thoughts on ““चँदा”

  1. बहुत खूबसूरत कविता लिखी है आपने….मायड भाषा की मिठास ही कुछ अलग होती होती है।

      1. Particularly these lines, else I managed to make sense

        मीत मळे मोतीडा जैडो हिवड़ा री सीपी में राखूं

        फेर भळे बळबळती कांबळ ओढ़ मसाणा में सोणो है

      2. मीत जो है वो मोती जैसा होना चाहिए जिसे ह्रदय के सीप में संभाल के रखा जा सके,प्रेम गंगाजल जैसा होना चाहिए जिसे इंसान सर झुका के श्रद्धा से चखता है।क्योंकि आखिर में तो इन्सान को लकड़ियों के बिस्तर पे आग की गर्म कम्बल को ओढ़कर श्मसान में ही सोना है।😊😊
        समझ गए ना..
        अच्छा लगा राजस्थानी पढ़ने की कोशिश की।शुक्रिया

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