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“क्या फूटपाथो पे सोये हो?”

तुम बँगले में रहते हो,तुम मखमल पे सोते हो
तुम गाडी में फिरते हो,तो आखिर क्यों रोते हो
फिर किस बात का दर्द तुम्हें है,फिर क्यों आँख भिगोये हो
एक बात कहुँ,सच बोलोगे! क्या फूटपाथो पे सोये हो?

क्या सर्दी की तलवारों से जान उधड़ते देखी है?
क्या सावन की बरसातों में सांस उखड़ते देखी है?
क्या गर्मी की भट्टी में तुमने भी जिस्म जलाया है?
क्या अपने बच्चों की खातिर बासी खाना लाया है?
फिर किस बात का दर्द तुम्हें है,फिर क्यों आँख भिगोये हो
एक बात कहुँ,सच बोलोगे! क्या फूटपाथो पे सोये हो?

क्या बेटी के तन से लिपटी गिद्ध निगाहें देखी है?
क्या पीड़ा में स्याह हुई बीवी की बाँहे देखी है?
क्या तुमने बुड्ढी माँ को झूठी बातों से बहलाया है?
क्या अपने बापू से अपना जख्मी हाथ छुपाया है?
गर नहीं किया तो कब हारे, कब टूटे, कब रोये हो?
एक बात कहुँ,सच बोलोगे! क्या फूटपाथो पे सोये हो?

क्या तुमको अपने बिस्तर में आकर मार गया कोई
क्या बेटे की लाश समेटी या खून की दीवारे धोई
क्या मुफ़लिस होने की खातिर तुमने गाली खाई है
क्या कोई अपना खोया और जान की कीमत पाई है
क्या कचहरियों में पाँव घिसे है आस के पत्थर ढोये हो?
एक बात कहुँ,सच बोलोगे! क्या फूटपाथो पे सोये हो?

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19 thoughts on ““क्या फूटपाथो पे सोये हो?”

  1. sone ke pinjare bhi pinjara hoti hein
    sadkon pe jindagi ke liye lade
    ya bisthar pe azadi ke liye
    atma samman ke liye ladhe
    Ladhayi to ladhayi hoti hein
    sari jakhmein upar nahi dikta
    sari jakmonse khun nahi nikalta
    ansu tho behenge……
    Kisi ka ghar lut gaya
    aur kisi aur ka dil tut gaya……

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