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“मनचला”

अब भले तू गैर है लेकिन कभी मेरा तो था
मुस्कुरा लेगा अगर तो क्या बुरा हो जाएगा

शाम जो है ये शहर में तितलियों का वक्त है
गांव वालो देख लो मौसम हरा हो जाएगा

यार की अंगड़ाइयां ये उम्र और ये हौसला
धड़कने कहती है के मुझसे गुनाह हो जाएगा

चाँद शायद रात के कमरे का पहरेदार है
जो कभी मासूम था पर अब जवाँ हो जाएगा

ऐ मोहब्बत बख्श दे मेरी गली मेरा शहर
गर कोई टूटा तो मुझसा “मनचला” हो जाएगा

न जाने क्यों ये ग़ज़ल मुझे अपूर्ण लग रही है,आप सभी बुद्धिजीवी मित्रों से इसी काफिये में ‘शेर’ आमंत्रित है।

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28 thoughts on ““मनचला”

  1. Very nice.. उम्दा ख़यालात.. पर आपकी ये नज़्म ग़ज़ल नहीं कहलाएगी(सॉरी आपने नीचे नोट लिखा था ग़ज़ल अपूर्ण है.. इसलिए अपने अल्प ज्ञान को साझा कर रही हूँ)

    मतला, काफ़िया, रदीफ़ का होना किसी भी ग़ज़ल के निश्चित नियम हैं

    मक़्ता और मीटर(या बहर) हों तो सोने पे सुहागा होता है

    वर्डप्रेस पे कोई प्राइवेट मैसेज डालने की सुविधा नहीं है इसलिए कमेंट में लिखा.. अगर मेरी बात बुरी लगी हो तो क्षमा करें 🙏🙏

    1. मुझे पता है, मैडम आपकी सलाह के लिए धन्यवाद….मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लिखा…आपका ज्ञान साझा करते रहिये..अच्छा लगता है।पढ़ने के लिए बेहद धन्यवाद

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