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“त्यौहार”


तिमिरधि में दीपमाला को सजाना बाद में
देह वस्त्रो से सजा भौतिकता दिखाना बाद में
स्वार्थ पर श्रद्धा चढ़ा लक्ष्मी मनाना बाद में
अज्ञ के तम को मिटाने चलो विज्ञ ज्योति जगाये

काष्ठ का रावण जलाना बस है अपना मन मनाना
मौन निर्जीव पूतले से क्या कोई सीता छुड़ाना
राम बन रावण जो छल गया है अपनी मैथिली को
लो चलो हम मैथिली के उन बंधनों को तोड़ आए

क्या करूँ रक्षा तेरी रक्षा में सक्षम मैं नहीं
द्रौपदी की लाज रखी ऐसे कृष्ण के सम मैं नहीं
पर हाथ में बाँधी जो राखी दे रहा हूँ ये वचन
आये जो तुझपे आपदा तो पहले वो मुझको मिटाये

न हरा न लाल हो न और कोई रंग हो
मीत ये चाहत है मेरी तू सदा ही संग हो
पीर तेरी मैं सहूँ तू मेरी खुशियां जिए
एक सी सिसकी भरे हम एक जैसा खिलखिलाए

आठवीं कक्षा में भारतीय त्यौहारो के सन्दर्भ में लिखी हुई मेरी ये कविता,आज किताबें पलटते हुए मिली…वैसी की वैसी पोस्ट कर रहा हूँ।आपका प्यार अपेक्षित है।

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12 thoughts on ““त्यौहार”

    1. Hahahaha…yes it was wrote in 8th std…bcoz i was backbencher and was in love of poetry….thnx for lovely cmments…ur cmmnts are as beautiful as your name…:)

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