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“मैं क्या कर बैठी”

मेरी आँखें बोल रही थी उसकी नीयत डोल रही थी
पवन भी धीमे इठलाकर साँसों में सरगम घोल रही थी
अपनी लाज बचा रखी थी उससे दुरी बना रखी थी
ईश ने लेकिन जाने कैसी मेरी किस्मत रचा रखी थी
और अचानक बिजली कौंधी मैं कोमलमन तब डर बैठी

फिर उस छलिया की बाँहों में मैं खुद ही खुद को भर बैठी
न चाहकर भी हे भगवन!क्यूँ मैं खुद को अर्पण कर बैठी
हाय सखी मैं क्याकर बैठी,हाय सखी मैं क्या कर बैठी

कुछ बात तो थी उस जालिम मैं या मौसम में अल्हड़ता थी
हाँ मैंने देखी उसकी तो हर हरकत में कामुकता थी
कोई बेला सी लिपटी थी मुझमे कैसी तरुणाई थी
मिट्टी भी यूँ महकी मानो बारिश पाकर पगलाई थी
उसकी साँसे बोली कुछ मेरे कानो की बाली से
बहक उठी मैं उसके अधरों की मर्दाना लाली से
फिर रुकी नही निज अधरो को उसके अधरो पे धर बैठी
न चाहकर भी हे भगवन! क्यूँ मैं खुद को अर्पण कर बैठी
हाय सखी मैं क्या कर बैठी,हाय सखी मैं क्या कर बैठी

मधु की बदली सिमट के जैसे हम पर आकर बरस रही हो
रति क्रीडा करने को आतुर ज्यूँ सांपो की जोड़ी उलझ रही हो
हम भी वैसे उलझ रहे थे एक दूजे के काले बालो से
शर्मीली लाली उतर गयी थी अब इन गोरे गालो से
अतृप्त धरा पर फिसल रहे थे मानो दो बर्फानी तन
गर्मी थी जज्बातों में और पिघल रहा था नवयौवन
मरुभूमि में एक सरिता सागर से संगम कर बैठी
न चाहकर भी हे भगवन! क्यूँ मैं खुद को अर्पण कर बैठी
हाय सखी मैं क्या कर बैठी,हाय सखी मैं क्या कर बैठी

मुझको तो मालूम नही था मैं भी इतनी सुंदर हूँ
उपमा हूँ सौंदर्या की जैसे खजुराहो का मंदिर हूँ
मैं प्रकृति हूँ और वो शिव हूँ उसने अहसास कराया है
दुनिया हम पर ही टिकी हुई है ये अहसास कराया है
जीवन उपवन तब तक सुंदर है जब तक ये हरी जवानी है
यौवन छलके तो अमृत है न छलके तो बस पानी है
सच बोलू तो आज सखी मैं अपना जनम सफल कर बैथी
वो मालिक है मैं दासी हूँ सो यौवन अर्पण कर बैठी
वो मालिक है मैं दासी हूँ सो यौवन अर्पण कर बैठी

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