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“विद्रोह”

बहुत देर से चुपचाप बैठी हो तुम
कहीं तुम घुट तो नहीं रही
तुम्हारा मन कोई राष्ट्र न हो जाये
तुम्हारी आँखें न देखने लगे नव-स्वप्न
तुम्हारी जुबान न बोलने लगे नारे
तुम्हारे हाथ न करने लगे आन्दोलन
तुम्हारे पाँव न चलने लगे शिखर पर
डरता हूँ मैं भी किसी सरकार की तरह
‘स्त्री’ तुम्हारे “विद्रोह” से…

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